केंद्रीय सरकार, शिक्षा मंत्रालय, विश्वविद्यालय प्रशासन के असामान्य हस्तक्षेप और पिछले वर्षों में नियुक्तियों में आरएसएस से संबंधित लोगों की छांट छांट कर भर्ती, शोध छात्रों की संख्या में बड़ी कटौती और दिल्ली पुलिस की मदद से मौजूदा सत्ता से असहमत छात्र संगठनों और सामान्य छात्रों के विरुध्द आतंक पैदा करने वाली हिंसक घटनाओं के बावजूद जेएनयू में एक बार फिर लाल परचम फहराया है
इसकी एक वजह यह भी है कि जेएनयूएसयू के चुनावों का संचालन छात्रों की ही एक चुनी हुई सर्वसम्मत इकाई करवाती है! यदि यह कार्य ज्ञानेश कुमार गुप्ता जी के हाथ में होता तो नतीजे निश्चित ही कुछ और होते!
जीते हुए उम्मीदवार इस प्रकार हैं। प्रेसिडेंट : अदिति मिश्रा (लेफ्ट यूनिटी)उपाध्यक्ष : के. गोपिका (लेफ्ट यूनिटी) महासचिव : सुनील यादव (लेफ्ट यूनिटी) और संयुक्त सचिव : दानिश अली (लेफ्ट यूनिटी)। भाजपा की छात्र इकाई एबीवीपी का सूपड़ा साफ होना इस बात का द्योतक है कि युवा भाजपा और संघ को भली-भांति समझ गए हैं। वे किसी दबाव और उत्पीड़न से नहीं डरे। शाबाश जेएनयू। इस शानदार जीत ने लाल परचम फहराकर वातावरण लाल कर दिया है।जो क्रांति का उद्घोष है।
विदित हो,1971 में जेएनयूएसयू चुनाव के बाद से, विश्वविद्यालय वामपंथी राजनीति का केंद्र रहा है। छात्र संघ अध्यक्ष पद पर अब तक एसएफआई ने 22 बार और एआईएसआई ने 12 बार जीत हासिल की है, जो वामपंथी विरासत को बताती है। एबीवीपी को केवल एक बार, साल 2000 में, संदीप महापात्रा ने महज एक वोट से जीत दिलाई थी। एनएसयूआई के तनवीर अख्तर ने 1991 में जीत दर्ज की थी।
कोविड-19 के कारण चार साल के बाद, 2023 में वाम एकता ने फिर से सभी चार पद जीतकर अपनी पकड़ मजबूत की थी। इस बार, लेफ्ट यूनिटी ने अपने इतिहास को दोहराया है।
नई चुनी गई यूनियन कई जरूरी स्टूडेंट समस्याओं को हल करने में बहुत अहम् होती है जैसे लाइब्रेरी और हॉस्टल की सुविधाओं को बेहतर बनाना। एकेडमिक सिस्टम में बदलाव करना, रिसर्च के लिए ज़्यादा पैसा पाना और कैंपस को सभी के लिए ज्यादा वेलकमिंग बनाना, नेशनल एजुकेशन पॉलिसी, कैंपस की आजादी और स्टूडेंट वेलफेयर पर चर्चाएं नई यूनियन की टु डू लिस्ट में सबसे ऊपर रहने की उम्मीद की जा सकती है।
यूनिवर्सिटी ने इलेक्शन कमेटी की तारीफ़ की है कि उन्होंने यह पक्का किया कि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष और खुली हो। इस बीच, जीतने वाले उम्मीदवारों के समर्थक पूरे कैंपस में हॉस्टल और मैदानों में नारे लगाकर और बैनर लहराकर खूब जश्न मना रहे हैं ।
और अब जब जेएनयूएसयू 2025 के नतीजे आ गए हैं, तो कैंपस में राजनीतिक बातचीत एक नए दौर में पहुँच गई है। यह भारत के सबसे ज़्यादा राजनीतिक रूप से जागरूक विश्व विद्यालयों में से एक है जिसमें सक्रिय स्टूडेंट भागीदारी और ज़ोरदार बहसों के एक और साल के लिए मंच तैयार करता है।
जेएनयू के इन चुनावों से देश में हो रहे चुनाव को सबक सीखने की ज़रुरत है। यहां चुनाव आयोग जैसा छल छंद नहीं है।सभी यूनियनों के लोग विद्यार्थियों के बीच अपनी बात रखते हैं। विद्यार्थी ही चुनाव सम्पन्न कराते हैं और फिर सब मिलकर जय पराजय को भूलकर खुशनुमा माहौल में जश्न मनाते हैं तथा चयनित फेडरेशन को सहयोग करते हैं
सबसे बड़ी बात है जेएनयू की इस महान परम्परा को ख़त्म करने की भारत सरकार हज़ारहा कोशिश करने के बाद जेएनयू की रौनक बरकरार है। उम्मीद है यह निरंतरता और जागरूकता कायम रहेगी जिसने देश को महान नेता सीताराम येचुरी और कन्हैया कुमार तथा अनेक विद्वान दिए है। विश्व विद्यालय अपनी गरिमा बनाए रखेगा।ऐसा भरोसा है जिसका सम्मान दुनियाभर के लोग करते हैं। जेएनयू को लाल सलाम।